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Wednesday, June 29, 2022
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गोबर से शुरू किया कारोबार, बना रहे 20 तरह के इको फ्रेंडली प्रोडक्ट्स

धार्मिक अनुष्ठानों व पूजा अर्चना के समय भी गोबर को शुद्ध मानते हुए इसका उपयोग किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में घरों को को गोबर से लीपने, पूजा स्थल लीपने, दीपक बनाने व दीप स्थापना के लिए गोबर का उपयोग किया जाता है।

पर आज हम आपको एक ऐसे इंसान के बारे में बताएंगे जो गोबर का इस्तेमाल करके 20 तरह के इको फ्रेंडली प्रोडक्ट्स बना रहे हैं। उन्होंने गोशिल्प इंटरप्राइजेज’ की शुरुआत भी की है, जिसके जरिए वे गोबर से इको फ्रेंडली मूर्तियां और होम डेकॉर बना रहे हैं। आइये जानते है इनके बारे में।

विजय कुमार पाटीदार का नायाब खोज

प्लास्टिक और पीओपी से बनने वाली इन चीजों का एक बेहतरीन विकल्प ढूंढा है भोपाल के विजय कुमार पाटीदार ने। भोपाल में रहने वाले 29 साल के विजय मूलत: किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। विजय के पिता गांव छोड़कर नौकरी की तलाश में भोपाल आ गए। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और उनकी पढ़ाई सरकारी स्कूल में हुई।

इंजीनियरिंग में मास्टर किया विजय ने

विजय की हालात संभली तो वह इंंदौर के DAVV कॉलेज से इंजीनियरिंग की। उन्होंने गेट का एग्जाम भी क्लियर किया और फिर भोपाल से ही इंजीनियरिंग में मास्टर किया। पढ़ाई के लिए इधर-उधर परेशान होने वाले विजय अब खुद बच्चों को पढ़ाना चाहते थे। उन्होंने आस-पास की बस्ती में रह रहे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और रोजगार के लिए कॉलेज में बतौर प्रोफेसर पढ़ाया।

अपने दो दोस्तों के साथ निकाली तरकीब

विजय जैविक खेती करते हुए एक आत्मनिर्भर ज़िंदगी जीना चाहते थे। इसलिए उन्होंने गौशालाओं का भी भ्रमण किया और जाना कि कैसे पशुधन के गोबर से भी अच्छी कमाई की जा सकती है। विजय ने अपने दो दोस्त नीता दीप बाजपेई और अर्जुन पाटीदार ने मिलकर ‘गोशिल्प इंटरप्राइजेज’ की शुरुआत की। उन्होंने नागपुर में खादी ग्रामोद्योग से गोबर के अलग-अलग उत्पाद बनाना भी सीखा।

मात्र 10 हजार में काम शुरू

विजय और उनके दोनों दोस्तों ने मात्र 10 हजार रुपये में काम शुरू किया। उन्होंने छोटे-छोटे उत्पाद जैसे स्वस्तिक, ओम, छोटी मूर्तियां आदि बनानी शुरू की और फिर धीरे-धीरे इन्हें बाजार में उतारा। बाजार में प्रोडक्ट्स के उतारने के बाद लोगों ने खूब पसंद किया। लोगों द्वारा अच्छी प्रतिक्रिया मिलने के बाद विजय ने अपनी कंपनी का रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया।

गोबर के जरिए अब कमाई अच्छी

विजय का उद्देश्य है कि वह अपने बिज़नेस को जीरो-इन्वेस्टमेंट में चलाते रहें। इसलिए उन्होंने अभी तक कोई फंडिंग नहीं ली है। प्रोडक्ट्स से जितनी कमाई होती है उसे ही वह अपने बिजनेस में लगाते हैं। उन्हें अब तक की लागत में 60 हजार रुपए का फायदा ही हुआ है। गोशिप के सभी प्रोडक्ट्स प्लास्टिक और पीओपी जैसे हानिकारक चीजों से बने प्रोडक्ट्स का इको फ्रेंडली विकल्प हैं। क्योंकि उनके प्रोडक्ट्स में गोबर के अलावा और भी जो सामग्री इस्तेमाल होती हैं।

बहुत से लोग जिस गोबर को कचरा समझकर इसे खाली जगहों में फेंकते रहते हैं, उनसे आज विजय और उनके दोस्त कमाई का एक अच्छा जरिया बनाए हुए है। उनकी जितनी तारीफ की जाए कम है।

Shubham Jha
Shubham वर्तमान में पटना विश्वविद्यालय (Patna University) में स्नात्तकोत्तर के छात्र हैं। पढ़ाई के साथ-साथ शुभम अपनी लेखनी के माध्यम से दुनिया में बदलाव लाने की ख्वाहिश रखते हैं। इसके अलावे शुभम कॉलेज के गैर-शैक्षणिक क्रियाकलापों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
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422 COMMENTS

  1. Not only is the Cow sacred – but so is its dung and urine – as per Hindoo scriptures !

    Hindoos drink Cow Piss and eat Cow Dung – as per the Vedas and the Mahabharata.THAT IS Y THEY ARE LIMPET LIMPDICKS !

    This is the Mahabharata. It captures the genius of the Indian.dindooohindoo

    SECTION III (Paushya Parva)

    And that man addressed Utanka and said, ‘Eat thou of the dung of this bull.’ Utanka, however, was unwilling to comply. The man said again,

    ‘O Utanka, eat of it without scrutiny. Thy master ate of it before.’ And Utanka signified his assent and ate of the dung and drank of the
    urine of that bull, and rose respectfully, and washing his hands and mouth went to where King Paushya was.

    SECTION LXXVIII

    One should never feel any repugnance for the urine and the dung of the cow.
    One should always bathe, using cow-dung at the time. One should sit on dried cowdung.
    One should never cast one’s urine and excreta and other secretions on cowdung.

  2. Indians have a special equation with cows and dung !

    Hindoos eat Cow Dung,Cock Dung, Bird Dung . Goat Dung ,Cow Piss and Goat Piss and Elephant Piss ! dindooohindoo

    Elephant Urine

    Elephant urine “gajamutra” is used as an alkaline decoction preparation for a supposed cure to malignant sores. [ Ci.9.16 ] [ Ray 131 ]

    Goat Dung and Urine

    Goat droppings “ajashakrt” are prescribed as an accessory to surgical cauterization and is used for cauterizing diseased skin. In powdered form after drying and compounding with honey and cow’s urine it is used as a linctus for jaundice. [ Su 12.3 ] [ Utt.44.19 ] [Ray 130 ] Goat urine “ajamutra” is an ingredient for a paste that restores the natural colour to a cicatrix. [ Ci.I.86 ] [ Ray 130 ]

    Cock Dung and other Birds’ Droppings

    The dung of a specially fed cock “kukkutapurisha” is prescribed as an ingredient for a plaster used to cure malignant skin diseases [ Ci.9.15 ] [ Ray 132 ] Vulture droppings “grdhrapurisha” is an ingredient of a plaster fro bursting of non-boils [ Su.37.9 ] [ Ray 132 ]. A similar use exists for pigeon droppings “karikapurisha” and heron droppings “kapotapurisha” [ Su.37.9 ] [ Ray 132 ]. The hooves of animals are powdered and after burning restore the darkness to a cicatrix; a paste of the powder obtained by burning is a cure for baldness [ Ray 132 ] Animal horns are used as surgical instruments and the paste is aid to be a cure for baldness. [ Ray 133 [ [ Ray 110 ff ] meat of various kinds is good The urine of different animals is recommended for use as purifying and appetizing agents; for cardiac stimulants and many others. Each type of urine has special advantage

  3. He Makes Money Online WITHOUT Traffic?

    Most people believe that you need traffic to profit online…
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