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Tuesday, November 29, 2022
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काश, हरेला पर हरियाली के लिए यह उत्साह रहे बरकरार

पेड़-पौधों का मानव जीवन में बड़ा महत्व है। ये हमें न सिर्फ ऑक्सीजन देते हैं। बल्कि तमाम प्रकार के फल-फूल, जड़ी बूटियां और लकड़ियां आदि भी देते हैं। घर के आसपास पौधरोपण करने से गर्मी, भू क्षरण, धूल आदि की समस्या से बच सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण की भूमिका हर एक इंसान को निभानी चाहिए। इस भूमिका में उत्तराखंड के प्रकृति पर्व हरेला पर हरियाली के लिए उत्साह देखते बनता है। आइये जानते है इसके बारे में।

घर-घर खुशी से मनाया जाता है यह पर्व।

कुमाऊं में खुशहाली, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य, धनधान्य और हरियाली का प्रतीक हरेला पर्व घर-घर हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस बार 16 जुलाई को हरेला पर्व मनाया गया। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।

देवी देवताओ की भी पूजा की जाती है।

हरेला पर्व के साथ ही सावन मास शुरू हो जाता है। पर्व से नौ दिन पूर्व घर में स्थापित मंदिर में पांच या सात प्रकार के अनाज को मिलाकर एक टोकरी में बोया जाता है। हरेले के तिनके अगर टोकरी में भरभराकर उगें तो माना जाता है कि इस बार फसल अच्छी होगी। हरेला काटने से पूर्व कई तरह के पकवान बनाकर देवी देवताओं को भोग लगाने के बाद पूजन किया जाता है। हरेला पूजन के बाद घर परिवार के सभी लोगों को हरेला शिरोधारण कराया जाता है।

पौधरोपण,कर पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संकल्प।

हरेला पर्व पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है। इस पर्व से मौसम को पौधरोपण के लिए उपयुक्त माना जाता है। हरेला बोने के लिए उसी खेत की मिट्टी लाई जाती है जिसमें उचित पौधों के रोपण और अच्छी फसल का परीक्षण हो सके। सात या पांच प्रकार का अनाज बोया जाता है जो अनुकूल मृदा और मौसम चक्र का आभास कराता है।

उत्तराखंड में जरूरी है यह परंपरा।

उत्तराखंड के जंगल तमाम झंझावात से जूझ रहे हैं। वनों में कब आग लग जाए, कहा नहीं जा सकता। गतवर्ष तो अक्टूबर से ही जंगल धधक उठे थे, जो कि अमूमन गर्मियों में सुलगते हैं। अतिवृष्टि, भूस्खलन जैसी आपदाओं से भी जंगल कराह रहे हैं। इससे वन संपदा को हानि पहुंच रही है। ऐसे में आवश्यक है कि बदली परिस्थितियों के अनुसार कदम उठाए जाएं, जिसका रास्ता शोध से निकलता है। हरेला इन सारे परिस्थियों को जांचने का एक अच्छा रास्ता है।

हरेला पर्व में सभी उत्साहित दिखे।

इस बारे के हरेला पर्व में शहर गांव, सभी जगह पौधारोपण को लेकर होड़ सी नजर आई। न सिर्फ सरकार और विभाग, बल्कि तमाम संस्थाएं, संगठन एवं व्यक्तियों ने हरेला पर्व पर जगह-जगह पौधे लगाकर इनके संरक्षण-संवर्द्धन का संकल्प लिया। प्रकृति के सरंक्षण को यह बेहद आवश्यक भी है। बावजूद इसके पिछले अनुभव को देखते हुए आशंका के बादल भी कम नहीं हैं। यह पहली बार नहीं है, जब पौधारोपण के लिए हाथ उठे हों। प्रदेशभर में तमाम पर्व, अवसरों पर पौधारोपण होता है, मगर पौधे लगाने के बाद इन्हें लोग भूल जाते है। जरूरी है इस प्रथा को हमेशा कायम रखने की भूलने की नही।

Sunidhi Kashyap
सुनिधि वर्तमान में St Xavier's College से बीसीए कर रहीं हैं। पढ़ाई के साथ-साथ सुनिधि अपने खूबसूरत कलम से दुनिया में बदलाव लाने की हसरत भी रखती हैं।
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