उत्तराखंड

पुलिस महानिदेशक को शिकायत सौंपते हुए राज्य के विपक्षी दलों एवं जन संगठनों ने चिंता व्यक्त की ।

नफरती हिंसक प्रचारों पर पुलिस कार्यवाही करे

पुलिस महानिदेशक को शिकायत सौंपते हुए राज्य के विपक्षी दलों एवं जन संगठनों ने चिंता व्यक्त की ।

उत्तराखंड (देहरादून) शनिवार, 28 फरवरी 2026

आज पुलिस महानिदेशक को शिकायत सौंपते हुए राज्य के विपक्षी दलों एवं जन संगठनों ने चिंता व्यक्त की कि बीते 23 फरवरी को देहरादून के कुछ मोहल्लों में एक सांप्रदायिक परचा को अख़बारों के साथ बांटा गया था और फिर 25 फरवरी को इस पर्चे के आव्हान पर एक जुलुस भी हुआ था, लेकिन पुलिस की और से कोई कार्यवाही नहीं दिखाई दी है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य हमेशा शांति, लोकतंत्र एवं सौहार्द के लिए जाना जाता है,  लेकिन बीते कुछ सालों से लगातार कुछ संगठनों की और से नफरती प्रचार एवं हिंसक अभियान चलाये जा रहे हैं जिसपर पुलिस प्रशासन मूक दर्शक बने दिखाए दे रहे हैं। इस स्थिति में ऐसे एक परचा अख़बारों के साथ कैसे बांटा जा सकता है? हस्ताक्षरकर्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि  पुरोला, उत्तरकाशी, मसूरी, नैनीताल और अन्य अनेक जगहों पर जब इस प्रकार के कार्यक्रमों से हिंसा हुआ है जिसमें पुलिस कर्मी और आम जनता घायल हुए हैं, और आम जनता और ख़ास तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय की सम्पतियों पर नुक्सान हुआ है, पुलिस ऐसे कार्यक्रमों पर कार्यवाही क्यों नहीं कर रही है?  भारतीय न्याय संहिता के धारा 197(1)(b) के अनुसार, अगर कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक या जातिगत वर्ग के बारे में यह प्रचार करेगा कि उस वर्ग को अपने संवैधानिक हक़ों से वंचित किया जाना चाहिए, तो वह गंभीर अपराध होता है।  तो इस परचा एवं कार्यक्रम पर मुकदमा दर्ज की जानी चाहिए और  ज़िम्मेदार व्यक्तियों पर सख्त कार्यवाही की जानी चाहिए।  पुलिस उच्चतम न्यायलय के 2018 के फैसलों के अनुसार नफरती अपराधों पर रोक लगाने के लिए विशेष व्यवस्था बनाये और इस प्रकार के प्रचारों पर स्व:संज्ञान ले कर तुरंत कार्यवाही करे।

शिकायत को ईमेल द्वारा भेजा गया था।  शिकायत एवं  हस्ताक्षरकर्ताओं की सूचि सलग्न।

सेवा में,

पुलिस महानिदेशक उत्तराखंड

निर्देशालय, सुभाष रोड, देहरादून

विषय: आपराधिक प्रचारों पर कार्यवाही हेतु

महोदय,

23 फरवरी को देहरादून शहर के कुछ मोहल्लों में सुबह के अख़बारों के साथ एक परचा को बांटा गया।  “देवभूमि रक्षा मंच” के नाम से बांटे गए पर्चों पर नियम के विपरीत किसी प्रिंटर का नाम कहीं छपा नहीं है।  इस पर्चे में कुछ कथित घटनाओं की सूचि के साथ सरकारी अधिकारीयों एवं पुलिस प्रशासन पर आरोप लगाए गए हैं।  इसके साथ साथ बार बार इस परचा द्वारा इशारा किया गया है कि अपराध समुदाय विशेष की वजह से ही हो रहा है। इस पर्चे के अंदर 25 फरवरी को एक जुलूस के लिए आह्वान  भी था, और हैरान करने वाली बात यह है कि इस कार्यक्रम पर पुलिस प्रशासन ने कोई रोक भी नहीं लगायी।

उत्तराखंड राज्य हमेशा शांति, लोकतंत्र एवं सौहार्द के लिए जाना जाता है।  लेकिन बीते कुछ सालों से लगातार कुछ संगठनों की और से नफरती प्रचार एवं हिंसक अभियान चलाये जा रहे हैं जिसपर पुलिस प्रशासन मूक दर्शक बने दिखाए दे रहे हैं।

उत्तराखंड में अनेकों युवाओं के संगठन बने हुए हैं जो कहीं भी किसी ऐक्ट के अंतर्गत पंजीकृत नहीं है और उत्तराखंड का माहौल खराब करते हैं। इस स्थिति में ऐसे एक परचा अख़बारों के साथ कैसे बांटा जा सकता है? पुरोला, उत्तरकाशी, मसूरी, नैनीताल और अन्य अनेक जगहों पर जब इस प्रकार के कार्यक्रमों से हिंसा हुआ है जिसमें पुलिस कर्मी और आम जनता घायल हुए हैं, और आम जनता और ख़ास तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय की सम्पतियों पर नुक्सान हुआ है, पुलिस ऐसे कार्यक्रमों पर कार्यवाही क्यों नहीं कर रही है?

महोदय, इस सन्दर्भ में हम आपके संज्ञान में इस बात को लाना चाहेंगे कि भारतीय न्याय संहिता के धारा 197(1)(b) के अनुसार, अगर कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक या जातिगत वर्ग के बारे में यह प्रचार करेगा कि उस वर्ग को अपने संवैधानिक हक़ों से वंचित किया जाना चाहिए, तो वह गंभीर अपराध होता है।   लेकिन इस प्रकार की गत्तिविधियों पर कोई कार्यवाही होती हुई नहीं दिखाई दे रही है।

अतः हमारे आपसे निवेदन है कि:

– इस परचा एवं कार्यक्रम पर नामजद मुकदमा दर्ज कर ज़िम्मेदार व्यक्तियों पर सख्त कार्यवाही की जाये।

– पुलिस उच्चतम न्यायलय के 2018 के फैसलों के अनुसार नफरती अपराधों पर रोक लगाने के लिए विशेष व्यवस्था बनाये और इस प्रकार के प्रचारों पर स्व:संज्ञान ले कर तुरंत कार्यवाही  करे।

निवेदक

संजय शर्मा, कांग्रेस

डॉ सत्यनारायण सचान, राष्ट्रीय सचिव, समाजवादी पार्टी

समर भंडारी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

इंद्रेश मैखुरी, प्रदेश सचिव, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा – ले)

Adv हरबीर सिंह कुशवाहा, सर्वोदय मंडल उत्तराखंड

विनोद बडोनी एवं शंकर गोपाल, चेतना आंदोलन


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