हिमालयी सुरक्षा और आपदा जोखिम लचीलापन एवं न्यूनीकरण विषय पर आईआईटी रुड़की में हुई उच्च-स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा वर्चुअल रूप से किया गया गरिमामंडित

हिमालयी सुरक्षा और आपदा जोखिम लचीलापन एवं न्यूनीकरण विषय पर आईआईटी रुड़की में हुई उच्च-स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।
उत्तराखंड (देहरादून) शुक्रवार, 16 जनवरी 2026
आईआईटी रुड़की के ओ.पी. जैन सभागार में श्री त्रिलोचन उप्रेती स्मृति हिमालयी शोध संस्थान एवं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की द्वारा आपदा जोखिम लचीलापन एवं न्यूनीकरण विषय पर एक-दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, आपदा-प्रतिक्रिया एजेंसियों तथा शिक्षाविदों ने भाग लिया और विशेष रूप से उत्तराखंड के संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र सहित आपदा-प्रवण क्षेत्रों में तैयारी और लचीलेपन को सुदृढ़ करने पर विचार-विमर्श किया।
कार्यशाला को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा वर्चुअल रूप से गरिमामंडित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. के. के. पंत, निदेशक, आईआईटी रुड़की ने की। मंचासीन विशिष्ट अतिथियों में प्रो. यू. पी. सिंह, उप निदेशक, आईआईटी रुड़की; प्रो. संदीप सिंह, विभागाध्यक्ष, पृथ्वी विज्ञान विभाग, आईआईटी रुड़की एवं कार्यशाला के संयोजक; श्री भगवती प्रसाद राघव जी, क्षेत्रीय संयोजक (उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश) एवं अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, प्रज्ञा प्रवाह; उत्तराखंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारी; तथा राष्ट्रीय आपदा-प्रतिक्रिया एवं शोध संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल थे।
अपने स्वागत संबोधन में कार्यशाला की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए प्रो. संदीप सिंह ने आपदा प्रबंधन को केवल प्रतिक्रिया-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर पूर्वानुमान-आधारित, प्रौद्योगिकी-सक्षम लचीलापन अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया तथा इसमें भू – विज्ञान, रियल-टाइम डेटा और अंतर्विषयी शोध की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने हिमालय-केंद्रित अनुसंधान और ज्ञान प्रसार को आगे बढ़ाने में श्री त्रिलोचन उप्रेती स्मृति हिमालयी शोध संस्थान के साथ सहयोग को भी सराहा। इस दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए, आईआईटी रुड़की ने डेढ़ शताब्दी से अधिक की इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक उत्कृष्टता पर आधारित अपनी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दोहराया, जिसके अंतर्गत भूकंप विज्ञान, भूस्खलन एवं बाढ़ जोखिम आकलन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ, आपदा-रोधी अवसंरचना तथा क्षमता-निर्माण में सतत योगदान दिया जा रहा है, जो उत्तराखंड और देश के अन्य आपदा-प्रवण क्षेत्रों के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
अपने उद्घाटन संबोधन में प्रो. के. के. पंत, निदेशक, आईआईटी रुड़की ने इस बात पर बल दिया कि आपदा-लचीलापन को सतत विकास की आधारशिला के रूप में देखा जाना चाहिए, जो विकसित भारत @2047 की राष्ट्रीय परिकल्पना तथा सेंडाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन और संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों जैसे वैश्विक ढाँचों के अनुरूप हो। उन्होंने कहा कि आईआईटी रुड़की सरकार, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ मिलकर स्केलेबल प्रौद्योगिकियों की तैनाती, अंतर्विषयी अनुसंधान को बढ़ावा देने और आपदा-रोधी अवसंरचना एवं समुदायों के लिए कुशल मानव संसाधन विकसित करने की दिशा में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।
“आईआईटी रुड़की की जिम्मेदारी केवल ज्ञान सृजन तक सीमित नहीं है, बल्कि ज्ञान के प्रभावी अनुप्रयोग तक विस्तारित है। उन्नत विज्ञान, डिजिटल प्रौद्योगिकियों और नीतिगत सहभागिता को एकीकृत करते हुए, हम उत्तराखंड और देश को आपदा-प्रतिक्रिया से दीर्घकालिक लचीलेपन की ओर अग्रसर करने के साथ-साथ जोखिम न्यूनीकरण में वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं में भी योगदान देना चाहते हैं,” प्रो. के. के. पंत, निदेशक, आईआईटी रुड़की ने कहा।
अपने ऑनलाइन संबोधन के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री श्री धामी ने उत्तराखंड की भूकंप, भूस्खलन, बाढ़, बादल फटना, हिमस्खलन और वनाग्नि जैसी आपदाओं के प्रति संवेदनशीलता को रेखांकित किया और राहत-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर विकास नियोजन में अंतर्निहित, एकीकृत और प्रौद्योगिकी-आधारित आपदा-लचीलापन अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विशेष रूप से भूकंप प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, एआई-आधारित पूर्वानुमान, रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस-आधारित मॉडलिंग तथा नीति-निर्माण और जमीनी क्रियान्वयन में वैज्ञानिक सहयोग के क्षेत्र में आईआईटी रुड़की के राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण योगदान की सराहना की।
अपने संबोधन में सीएम श्री धामी ने कहा- “उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए विज्ञान-आधारित और प्रौद्योगिकी-सक्षम आपदा-तैयारी कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। आईआईटी रुड़की प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, वैज्ञानिक मानचित्रण और क्षमता-निर्माण को सुदृढ़ करने में एक प्रमुख राष्ट्रीय भागीदार के रूप में उभरा है, और राज्य सरकार एमओयू-आधारित सहयोग को और गहन करने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है, ताकि शोध के परिणाम वास्तविक समय में जीवन और आजीविका की सुरक्षा में परिवर्तित हो सकें,”
विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने विचार रखते हुए श्री भगवती प्रसाद राघव जी ने आपदा-तैयारी में सामूहिक सामाजिक सहभागिता, नैतिक नेतृत्व और समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण के महत्व को रेखांकित किया, जो प्रौद्योगिकी-आधारित हस्तक्षेपों को सामाजिक जागरूकता और संस्थागत समन्वय से पूरक बनाता है।
“वास्तविक लचीलापन तब उभरता है जब प्रौद्योगिकी, नीति और सामुदायिक कार्रवाई एक साथ आती हैं। इस प्रकार की कार्यशालाएँ वैज्ञानिक क्षमता को सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ संरेखित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं,” श्री भगवती प्रसाद राघव जी, क्षेत्रीय संयोजक (उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश), प्रज्ञा प्रवाह ने कहा।
तकनीकी सत्रों के अंतर्गत विशेषज्ञ व्याख्यानों के साथ “प्रतिक्रिया से लचीलेपन की ओर: प्रौद्योगिकी, नीति और सामुदायिक कार्रवाई के माध्यम से आपदा जोखिम न्यूनीकरण को सुदृढ़ करना” विषय पर एक उच्च-स्तरीय पैनल चर्चा आयोजित की गई। इन सत्रों में अग्रणी वैज्ञानिकों, वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान के निदेशक, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के वरिष्ठ अधिकारियों, रक्षा इंजीनियरिंग प्रतिष्ठानों तथा राष्ट्रीय शोध संस्थानों के विशेषज्ञों ने भाग लिया। चर्चाओं का केंद्र प्रारंभिक चेतावनी प्रसार, पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा-रोधी अवसंरचना, जलवायु-संबद्ध आपदा जोखिम और समन्वित प्रतिक्रिया तंत्र रहे। कार्यशाला का समापन आईआईटी रुड़की द्वारा सहयोगात्मक अनुसंधान, पायलट परियोजनाओं, क्षमता-निर्माण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु नीतिगत समर्थन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराने के साथ हुआ, जिससे उत्तराखंड में लचीलापन सुदृढ़ हो, राष्ट्रीय तैयारी में योगदान मिले और वैश्विक संस्थानों के साथ साझेदारी के माध्यम से अधिक सुरक्षित एवं लचीले समाजों का निर्माण हो सके।
कार्यशाला में एनआईएच, सीएसआईआर–सीबीआरआई, डब्ल्यूआईएचजी, भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, जीबीपीआईईटी, आईसीएफएआई विश्वविद्यालय, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, एनआईएचई और जेबीआईटी देहरादून सहित प्रमुख संस्थानों के वरिष्ठ नेतृत्व एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया। इसके साथ ही एसडीआरएफ और भारतीय सेना (बीईजी एंड सेंटर, रुड़की) के वरिष्ठ अधिकारियों की सहभागिता ने आपदा-लचीलापन पर वैज्ञानिक, नीतिगत और परिचालन दृष्टिकोण से चर्चाओं को और समृद्ध किया। कार्यक्रम का समापन प्रो. यू. पी. सिंह, उप निदेशक, आईआईटी रुड़की के संबोधन के साथ हुआ।
कार्यक्रम में प्रौद्योगिकी प्रदर्शन स्टॉल भी शामिल थे, जिनमें आपदा तैयारी हेतु एआई-आधारित भीड़ निगरानी और वीडियो एनालिटिक्स (पारिमित्रा प्रा. लि.); लचीली विद्युत प्रणालियों के लिए सोडियम-आयन बैटरी-आधारित ऊर्जा भंडारण समाधान (इंडी एनर्जी); बाढ़ निगरानी के लिए नॉन-कॉन्टैक्ट जल-स्तर मापन प्रणालियाँ; खतरा मानचित्रण और जोखिम आकलन के लिए भू-स्थानिक प्रौद्योगिकियाँ (भूमिकैम प्रा. लि., सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी रुड़की); तथा सिसमिक हैजार्ड एंड रिस्क इंवेस्टिगेशन प्राइवेट लिमिटेड (एसएचआरआई) द्वारा अपनी एआई भागीदार कंपनी NanoAI के सहयोग से विकसित उन्नत एवं स्वदेशी आपदा जोखिम न्यूनीकरण तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। सामूहिक रूप से, इन प्रदर्शनों ने प्रारंभिक चेतावनी, अवसंरचना लचीलापन तथा आपातकालीन तैयारी को सुदृढ़ करने वाले व्यावहारिक और स्केलेबल नवाचारों को उजागर किया।इन प्रदर्शनों ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण, अवसंरचना लचीलापन और आपातकालीन तैयारी को सशक्त बनाने वाली व्यावहारिक और स्केलेबल नवाचारों को उजागर किया।




