कांठ बंगला बस्ती को हटाने की प्रक्रिया विधि विरुद्ध एवं जन विरोधी।
प्रतिनिधि मंडल ने नगर निगम को ज्ञापन दिया

कांठ बंगला बस्ती को हटाने की प्रक्रिया विधि विरुद्ध एवं जन विरोधी।
उत्तराखंड (देहरादून) वीरवार, 19 फरवरी 2026
कांठ बंगला बस्ती में पुनर्वास के नाम पर हो रही ज़बरन विस्थापन प्रक्रिया को गैर क़ानूनी एवं जन विरोधी ठहराते हुए प्रतिनिधि मंडल नगर निगम में ज्ञापन सौंपवा कर प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की। उन्होंने कहा कि बार बार 2018 के मलिन बस्ती अधिनियम के धारा 4 द्वारा बेदखली पर स्पष्ट रोक होने के बावजूद, बार बार लोगों को धमकाया जा रहा है कि उनके घरों को तोडा जायेगा। अब इतवार 15 तारीख को बिना मोर, नाम, पद और कार्यालय की जानकारी बस्ती में एक कागज़ को चिपका या गया यह कहते हुए कि लोगों को अपने घरों को तीन दिन के अंदर खाली करना होगा। अब तक प्रशासन ने लोगों को कुछ नहीं बताया है कि वह ऐसे जगह में लोगों को कैसे विस्थापित कर सकते हैं जो खुद नदी के बीच में बना हुआ है, जिसकी सेफ्टी के बारे में कोई जानकारी नहीं है, और जहाँ पर फ्लैट प्रधान मंत्री आवास योजना के तहत 30 वर्ग मीटर घर बनना चाहिए, यह फ्लैट उससे काफी छोटा है। प्रशासन यह भी नहीं बता रहा है कि लोगों से कितना शुल्क लिया जाएगा, इन फ्लैटों को किन शर्तों भी दिया जा रहा है, और वह कब तक वहां पर रह पाएंगे। सवाल यह भी उठता है कि उच्च न्यायालय के जिन फैसलों का उल्लेख प्रशासन कर रहा है, वह उस फ्लैट काम्प्लेक्स पर भी लागू होगा क्योंकि वह भी नदी के बीच में है, तो प्रशासन की राय के अनुसार फ्लैटों को भी तोडा जाना चाहिए। इन सारे बातों पर प्रभावित परिवारों ने लिखित रूप में दिसंबर के पहले सप्ताह में ही अपनी आपत्तियां दर्ज कर दी थी, लेकिन आज तक उन आपत्तियों पर किसी निस्तारण नहीं हुआ है, और निस्तारण की जगह में ऐसी धमकाने वाली कागज़ों को चिपकायी जा रही है जिससे यह भी पता नहीं चल पा रहा है कि यह कागज़ किसी विभाग का है या किसी की शरारत है। प्रतिनिधि मंडल ने मांग उठायी कि जब 2016 के मलिन बस्ती अधिनियम की नियमावली में बस्तियों का नियमितीकरण एवं पुनर्वास को ले कर पूरी प्रक्रिया के लिए प्रावधान है, तो सरकार को इस गैर क़ानूनी, मनमानी वाली प्रक्रिया को रद्द कर कानून के अनुसार चलना चाहिए। इस प्रकार की प्रक्रिया से बस्ती में तनाव का माहौल है और सरकार बदनाम हो रहा है। 
ज्ञापन उप नगर आयुक्त संतोष कुमार पांडेय को सौंपवाया गया था। उन्होंने कहा कि इन बातों को मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण एवं नगर निगम के उच्च अधिकारियों तक पहुंचवाया जायेगा और उनपर विचार किया जायेगा। प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय शर्मा, प्रवीण त्यागी, और सोनिया आनंद रावत; सर्वोदय मंडल उत्तराखंड के हरबीर सिंह कुशवाहा; चेतना आंदोलन की सुनीता देवी, राजेश्वरी, शैलेश इत्यादि; और प्रभावित बस्ती के दोनों भागों के प्रतिनिधि शामिल रहे।
ज्ञापन सलग्न।
निवेदक
दून समग्र विकास अभियान
*ज्ञापन*
सेवा में,
उपाध्यक्ष
मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण
विषय: कांठ बंगला बस्ती को ले कर गैर क़ानूनी कार्यवाही
महोदय,
हम विभिन्न सामाजिक संगठनों एवं राजनैतिक दलों की और से प्रदेश की मज़दूर बस्तियों में चल रही कार्यवाहियों को लगातार देख रहे हैं, और इस सन्दर्भ में हम कांठ बंगला बस्ती में पुनर्वास के नाम पर चल रही प्रक्रिया को ले कर गंभीर चिंता व्यक्त करना चाहेंगे। इतवार को इस बस्ती में “सूचना” के नाम पर कुछ कागज़ों को दीवारों पर चिप काए गए हैं। न इन कागज़ों पर किसी कार्यालय का नाम है, न किसी अधिकारी का, न कोई पत्रांक है, और न ही कोई तारीख। जिससे लग रहा है कि यह शरारतपूर्ण कार्य भी हो सकता है, तो हमारा निवेदन है कि इसकी जांच की जाये। इसके साथ साथ एक सूचि को भी चिपकाया गया है और इस सूचि पर भी किसी कार्यालय का नाम नहीं है, और न ही इस कथित पुनर्वास योजना के बारे में कोई जानकारी है। यह फ्लैट किन शर्तों पर दिए जा रहे हैं, उनपर मालिकाना हक़ मिलेगा कि नहीं, और इसके लिए कितना शुल्क या किराया लिया जायेगा, इन सारे बातों पर कोई भी जानकारी अभी तक नहीं दी गयी है।
इस सन्दर्भ में हम आपके संज्ञान में कुछ और बातों को भी लाना चाहेंगे:
1. विधान सभा द्वारा पारित उत्तराखंड नगर निकायों और प्राधिकरणों हेतु विशेष प्रावधान अधिनियम, 2018 (उत्तराखंड अधिनियम संख्या 24 वर्ष 2021 एवं उत्तराखंड अधिनियम संख्या 5 वर्ष 2025 द्वारा संशोधित) के धारा 4(2) के अनुसार “किसी निर्णय, डिक्री तथा न्यायालयों के आदेशों से सम्बन्धित प्रकरणों के अतिरिक्त जो कि उपधारा 4(1) में वर्णित हैं, में दिनांक 11.03.2016 की स्थिति के अनुसार यथास्थिति बनायी रखी जा सकेगी।” धारा 4(3) के अनुसार “उपधारा (1) में संदर्भित अनाधिकृत निर्माण से सम्बन्धित प्रकरणों में किसी भी स्थानीय निकाय/प्राधिकरण द्वारा दिये गये नोटिस के फलस्वरूप होने वाली दण्डात्मक कार्यवाही इस अधिनियम के लागू होने की दिनांक से आगामी 09 वर्ष के लिए स्थगित रहेगी एवं इस अवधि में इन प्रकरणों पर कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जा सकेगी।” आपके कार्यालय की और से तथाकथित नोटिस के नाम पर नवंबर में जारी किये गए पत्रों में इस बात को प्रमाणित की गयी है कि प्रभावित लोगों के घर 2016 से पहले से ही बने थे। हमारा मानना है कि मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण एवं देहरादून नगर निगम ज़िम्मेदार सरकारी विभाग होने के नाते ऐसे विधि विरुद्ध कदम नहीं उठा सकते हैं, तो हम आपसे निवेदन करना चाहेंगे कि इन गैर क़ानूनी पत्रों को रद्द कर इनपर जाँच बैठाया जाये।
2. आपके कार्यालय की और से आये व्यक्तिगत पत्र पर दिसम्बर महीने में ही प्रभावित परिवारों की और से 15 दिन के अंदर ही आपत्ति दर्ज कराई गयी थी। आज तक इन आपत्तियों पर क्या निस्तारण हुआ था, इसपर हमें कोई जानकारी नहीं दी गयी है। उसकी जगह में अचानक “सूचना” के नाम पर कागज़ों को चिपकाया गया है। इस तरह के कार्यों से बस्ती के निवासियों के बीच में तनाव भी फैला हुआ है और सरकार बदनाम भी हो रही है।
3. विधान सभा द्वारा पारित उत्तराखंड राज्य की नगर निकायों में अवस्थित मलिन बस्तियों के सुधार, विनियमितीकरण, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यस्थापन एवं अतिक्रमण निषेध अधिनियम, 2016, के अंतर्गत पुनर्वास की प्रक्रिया पहले से ही तय है। उस अधिनियम के अंतर्गत बनी नियमावली के नियम 3 के अनुसार जिला स्तरीय समिति बननी चाहिए थी, बस्तियों का सर्वे होना चाहिए था, और नियम 10 में दी गयी प्रक्रिया के अनुसार प्रभावित लोगों की भागीदारी से पुनर्वास का योजना बनना चाहिए था। हमारी जानकारी में प्रशासन ने आज तक इन सारे प्रावधानों को ले कर कोई भी कार्यवाही नहीं की और प्रदेश की मलिन बस्तियों में आज तक वही स्थिति है जो 2016 में थी। प्रशासन की और से इस संबंध में हमें कोई जानकारी नहीं दी गयी है और न ही बस्ती के निवासियों से कोई राय ली गयी है। इसलिए भी यह प्रक्रिया कानून के अनुसार नहीं है।
4. जिस फ्लैट कॉम्प्लेक्स की बात की जा रही है, वह पंद्रह साल से ज्यादा आधा निर्मित स्थिति में रहा। वह नदी के बीच में बना हुआ हैं। इसलिए जब तक इसकी सुरक्षा के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है, वहां पर लोगों को विस्थापित करना हमारी जान को जोखिम में डालने के समान होगा। इसके आलावा यह फ्लैट पुरे परिवार के लिए रहने लायक नहीं है। प्रधान मंत्री आवास योजना के तहत 30 वर्ग मीटर तक की मकान बनायी जा सकती है, लेकिन यह फ्लैट शायद 20 वर्ग मीटर से छोटा ही है। इसमें पानी और बिजली की स्थिति क्या है, यह भी स्पष्ट नहीं है।
5. यह फ्लैट कॉम्प्लेक्स नदी के बीच में बना हुआ है। जो घर नदी से ज्यादा दूर है, उसको तोड़ने की बात हो रही है, तो उस लिहाज़ से इस फ्लैट काम्प्लेक्स को भी तोडा जाना चाहिए। इसलिए इस प्रकार के कॉम्प्लेक्स में हमें शिफ्ट करना नीतिगत रूप से गलत है।
6. हम आपके संज्ञान में इस बात को भी लाना चाहेंगे कि 14 जनवरी को इस मामले को ले कर माननीय राष्ट्रीय अनुसूचित जाती आयोग द्वारा जिलाधिकारी देहरादून को नोटिस भेजा गया था। जिसपर आज तक कोई जवाब नहीं दिया गया है।
अतः उपरोक्त कारणों की वजह से आपसे विनम्र निवेदन है कि इस विधि विरुद्ध कार्यवाही पर तुरंत रोक लगाया जाये।
निवेदक
प्रतिलिपि: मुख्य सचिव, उत्तराखंड सरकार
नगर आयुक्त, नगर निगम, देहरादून



