उत्तराखंड

धरोहर 2025 मेले में प्रसिद्ध गायक सतीश थापा और गायिका दीप्ति राणा ने मधुर गीतों में अपने गांव की संस्कृत परंपराओं और लोक धुन को मंच पर प्रस्तुत किया।

धरोहर 2025 मेले में प्रसिद्ध गायक सतीश थापा और गायिका दीप्ति राणा ने मधुर गीतों में अपने गांव की संस्कृत परंपराओं और लोक धुन को मंच पर प्रस्तुत किया।

धरोहर 2025 मेले में प्रसिद्ध गायक सतीश थापा और गायिका दीप्ति राणा ने मधुर गीतों में अपने गांव की संस्कृत परंपराओं और लोक धुन को मंच पर प्रस्तुत किया।

उत्तराखंड (देहरादून) बुधवार, 11 जून 2025

देहरादून के परेड ग्राउंड में इन दिनों धरोहर 2025 मेले की धूम है जो उत्तराखंड की पारंपरिक संस्कृति हस्तशिल्प और पहाड़ी उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए उपस्थित किया गया इस संस्कृत जहां एक और पार पिक लोक उत्पादों की खरीदारी के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है वहीं दूसरी और संस्कृतिक मंच पर देश विदेश की विविध लोक सांस्कृतियो की प्रसूति लोगों का भरपूर मंजन कर रही है इसी क्रम में सोमवार को नेपाली लोक सांस्कृति की झलक देखने को मिली जब प्रसिद्ध गायक सतीश थापा और गायिका दीप्ति राणा ने मधुर गीतों से मेले में मौजूद दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया दोनों कलाकारों ने अपने गांव की संस्कृत परंपराओं और लोक धुन को मंच पर प्रस्तुत किया जिसको देखकर दर्शक झूम ने लगे नेपाली संगीत की मीठी आवाज पर बच्चों से ले कर बुजुर्ग तक तालिया बजाई और ठुमके लगाए यह सांस्कृतिक कार्यक्रम सिर्फ मनोरंजन नहीं था बल्कि यहां भारत नेपाल के पारंपरिक और संस्कृत रिश्तो की एक खूबसूरत मिसाल बना।

देहरादून के परेड ग्राउंड में इन दिनों धरोहर 2025 मेले की धूम है जो उत्तराखंड की पारंपरिक संस्कृति हस्तशिल्प और पहाड़ी उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए उपस्थित किया गया इस संस्कृत जहां एक और पार पिक लोक उत्पादों की खरीदारी के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है वहीं दूसरी और संस्कृतिक मंच पर देश विदेश की विविध लोक सांस्कृतियो की प्रसूति लोगों का भरपूर मंजन कर रही है इसी क्रम में सोमवार को नेपाली लोक सांस्कृति की झलक देखने को मिली जब प्रसिद्ध गायक सतीश थापा और गायिका दीप्ति राणा ने मधुर गीतों से मेले में मौजूद दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया दोनों कलाकारों ने अपने गांव की संस्कृत परंपराओं और लोक धुन को मंच पर प्रस्तुत किया जिसको देखकर दर्शक झूम ने लगे नेपाली संगीत की मीठी आवाज पर बच्चों से ले कर बुजुर्ग तक तालिया बजाई और ठुमके लगाए यह सांस्कृतिक कार्यक्रम सिर्फ मनोरंजन नहीं था बल्कि यहां भारत नेपाल के पारंपरिक और संस्कृत रिश्तो की एक खूबसूरत मिसाल बना।

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